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शेरों की दहाड़ से पहचान रखने वाली श्री रेणुका सफारी में दुर्लभ “बारहसिंगा” के शिशु की किलकारी…


नाहन, 29 जुलाई : एक समय में शेरों की दहाड़ (roar of lions) के लिए पहचान रखने वाली रेणुका जी लायन सफारी (Renuka ji Lion Safari) में इन दिनों बारहसिंगा (Swamp Deer) के शिशु की किलकारी गूंज रही है। वाइल्ड लाइफ महकमे ने भी नन्हे मेहमान के स्वागत में पलकें बिछा रखी है। 2017 में दो मादा व एक नर बारहसिंगा को लखनऊ से लाया गया था। 5 साल बाद मादा बारहसिंघा ने पहली बार सफल प्रजनन किया है। इस प्रजाति को दलदली हिरण (Rucervus duvaucelii) भी कहा जाता है। ये एक अत्यधिक लुप्तप्राय प्रजाति (endangered species) है।

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 (Wildlife Protection Act 1972) में इसे शेड्यूल एक संरक्षित किया गया है। प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (आईयूसीएन) ने प्रजाति को दुर्लभ जानवरों की रेड डाटा सूची (Red Data List of Animals) में भी शामिल किया हुआ है। हिमाचल के किसी भी चिड़ियाघर में ये प्रजाति मौजूद नहीं है। वैसे भारत में ये वन्य प्राणी मध्यप्रदेश में पाया जाता है, लेकिन अच्छी बात यह है कि इसे राज्य की शिवालिक पहाड़ियों (Shivalik Hills) की अब हवा रास आ गई है।  

       हालांकि सिरमौर के निचले इलाकों में बारहसिंगा साइट होने की बातें सामने आती रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों की माने तो अक्सर ही सांभर को बारहसिंगा मान लिया जाता है। श्री रेणुका जी के समीप धनोई पुल के समीप भी करीब 10 साल पहले बारहसिंघा साइट होने की बात सामने आई थी, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि स्वाम्प हिरण की साइटिंग रिकॉर्ड में नहीं है।

  रोचक बात यह है कि शेरों की दहाड़ बेशक ही अब सुनाई नहीं देती है, लेकिन बारहसिंगा के शिशु की किलकारी जरूर सुनी जा रही है। जानकारों की मानें तो सुबह के वक्त शिशु को खास फीड दिया जाता है, इसके बाद दिन के वक्त हरे घास का चारा भोजन में परोसा जाता है।

गौरतलब है कि सफारी में भालुओ की संख्या भी 5 हो चुकी है, इनकी उछल कूद व दहाड़ भी पर्यटकों के लिए खासा रोमांच पैदा करती हैं। समुद्र तल से 672 मीटर की ऊंचाई पर भालुओं का अति जीवन (Survival) भी अनोखी बात है।  

   उम्मीद की जा रही है कि अगले कुछ समय में सफारी की तस्वीर बदलेगी। टाइगर के जोड़े को लाने की भी कवायद चल रही है। बताते हैं कि वाइल्ड लाइफ में टाइगर के जोड़े के लिए एनक्लोजर (Enclosure) निर्माण की रूपरेखा तैयार कर केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (Central Zoo Authority) को भेजी गई है। मंजूरी मिलते ही एंक्लोजर का निर्माण शुरू हो पाएगा।

 एक वक्त था जब श्री रेणुका जी सफरी शेरों की दहाड़ के लिए दूर-दूर तक मशहूर थी, यहां शेरों का कुनबा डबल डिजिट में पहुंच गया था, लेकिन समय  की मार की वजह से  मौजूदा में सफारी सूनी पड़ी है,एक भी शेर नहीं है। पिछले सालो में सिरमौर की सिंबलवाडा सेंचुरी (Simbalvara Century) का दर्जा बढ़कर नेशनल पार्क (National Park) जरूर हुआ है। करीब सवा साल पहले कोलर इलाके में किंग कोबरा (King Cobra) की साइटिंग (Sighting) हुई थी।  हिमाचल में पहली बार किंग कोबरा सबूतों के साथ रिपोर्ट हुआ था।

उधर श्री रेणुका जी वाइल्ड लाइफ सेंचुरी (Shri Renuka Ji Wildlife Sanctuary) के वन परिक्षेत्र अधिकारी नंदलाल ने कहा कि करीब 10  जुलाई को बारहसिंगा के शिशु ने जन्म लिया था जिसे टीम ने 11 जुलाई को देखा था।

इसी बीच हिमाचल प्रदेश वाइल्ड लाइफ विभाग के अतिरिक्त प्रधान मुख्य अरण्यपाल अनिल ठाकुर ने एमबीएम न्यूज़ नेटवर्क से बातचीत में कहा कि पांच साल बाद प्रजनन हुआ है। उन्होंने कहा कि राज्य में ये प्रजाति किसी भी चिड़ियाघर में नहीं है। उन्होंने माना कि बारहसिंगा की ये लुप्तप्राय प्रजाति है।        

ये खास
बारहसिंगा का सबसे विलक्षण अंग है उसके सींग। वयस्क नर में इसकी सींग की 10-14 शाखाएं होती हैं, हालांकि कुछ में 20 तक की शाखाएं भी पाई गई हैं। इसका नाम इन्ही शाखाओं की वजह से पड़ा है, जिसका अर्थ होता है बारह सींग वाला।