| |

मंडी : रूटस्टॉक के पौधे लगाकर सेब के बागवान हो रहे बाग-बाग, दोगुनी हुई आय 

मंडी, 07 जुलाई : हिमाचल सरकार की बागवानी विकास परियोजना ने बागवानों की तकदीर बदलकर रख दी है। इस परियोजना से बागवानों की आय कम से कम दोगुनी तो हर हाल में हो रही है। नई तकनीक का इस्तेमाल करके बागवान, बाग-बाग नजर आ रहे हैं। 

 हिमाचल प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद में बागवानी का अहम योगदान है और इस योगदान को और ज्यादा बढ़ाने की दिशा में केंद्र और प्रदेश सरकारें लगातार प्रयासरत हैं। विश्व बैंक (World Bank) द्वारा प्रायोजित हिमाचल प्रदेश बागवानी विकास परियोजना, ऐसा ही एक प्रयास है बागवानों की खुशहाली के लिए।

 वर्ष 2015-16 में शुरू हुई इस परियोजना के तहत बागवानों को रूटस्टॉक प्रणाली के साथ जोड़ा गया। बागवानों ने सेब उत्पादन की पुरानी तकनीक से किनारा करके रूटस्टॉक प्रणाली को अपनाया और अब उसके सार्थक परिणाम सामने आने लग गए हैं।

सराजघाटी में काफी बड़े पैमाने पर सेब उत्पादन होता है। घाटी के बगस्याड़ गांव निवासी बागवान हेमंत कुमार और कुशाल ठाकुर ने बताया कि पुरानी तकनीक से उन्हें उतना मुनाफा नहीं होता था, जितना रूटस्टॉक प्रणाली से हो रहा है। कम भूमि पर अधिक पौधे लग पा रहे हैं और अच्छी फसल प्राप्त हो रही है, जिसकी बाजारों में भारी डिमांड है। 
यहीं नहीं, सरकार बागवानों को पॉली हाउस लगाने, सिंचाई सुविधा देने, एंटी हेल नेट लगाने और

टनाशकों की खरीद के लिए भारी सब्सिडी प्रदान कर रही है। बागवानों का कहना है कि अगर ज्यादा मुनाफा न भी हुआ तो पहले के मुकाबले दोगुना मुनाफा तो हर हाल में होना ही है।

 उद्यान विभाग के जिला विषयवाद विशेषज्ञ डा. नरदेव ठाकुर ने बताया कि हिमाचल में प्रति हेक्टेयर 4 या 5 मिट्रिक टन उत्पादन ही होता था, जबकि विदेशों में रूटस्टॉक तकनीक से प्रति हेक्टेयर 50 से 60 मिट्रिक टन उत्पादन किया जाता है। इस उत्पादन को यहां बढ़ाने के उद्देश्य से ही केंद्र और राज्य सरकार ने बागवानी विकास परियोजना की शुरूआत की है।

वर्ष 2015-16 से लेकर अब तक जिला भर के 1771 बागवानों को रूटस्टॉक और नई तकनीक के 91222 पौधे मुहैया करवाए जा चुके हैं। इस परियोजना के तहत मंडी जिला के लिए 200 करोड़ रूपए खर्च करने का प्रावधान रखा गया है।

उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश बागवानी विकास परियोजना सिर्फ सेब के बागवानों के लिए ही नहीं बल्कि अन्य प्रकार का फलोत्पादन करने वाले बागवानों के लिए भी है। इसके माध्यम से बागवानों को रूटस्टॉक तकनीक के साथ जोड़कर कम लागत में अधिक मुनाफा देने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।