|

सास व बहू ने अपनाई आत्मनिर्भरता की राह, बनाए गोबर व मिट्टी के दीपक…

भुंतर, 12 नवंबर : इस बार दीपावली का त्यौहार गोबर व मुल्तानी मिट्टी से बने दीपकों से रोशन होगा। अगर हम कुल्लू की बात करें तो कुल्लू व नगर ब्लॉक से स्वसहायता समूह की महिलाएं रंगबिरंगे आकर्षक दीपक बना रही हैं। यह दीपक गाय के गोबर मुल्तानी मिट्टी के मिश्रण के साथ एक सांचे में तैयार किए जा रहे हैं जोकि प्रदूषण रहित है। इस्तेमाल के उपरांत इन दीपकों से ऑर्गेनिक खाद तैयार होगी। कुल्लू के ग्राम पंचायत जिया की स्वयं सहायता समूह से जुड़ी सास और बहू ने पुरानी परंपरा को कायम रखते हुए गाय के गोबर व मुल्तानी मिट्टी के दीपक हाथों से तैयार कर रही है।

यह किसी भी सांचे का प्रयोग नहीं कर रही है। हालांकि इन दीपकों को बनाने में खर्चा कम है लेकिन मेहनत बहुत ज्यादा है। जिया की यह सास व बहू अपनी प्राचीन परंपराओं का प्रचलन कायम रखने के लिए एक बहुत ही अच्छा संदेश जनता को दे रही है। हालांकि सांचे से बने दीपक में सफाई अच्छी आती हैं और समय की बचत भी होती है। लेकिन जिया गांव की सास व बहु ने केवल हाथों से ही दीपक तैयार कर एक मिशाल पेश की ओर पुरानी परंपरा को कायम रखा, जो बहुत बड़ी बात है। अभी तक यह दोनों महिलाएं हाथों से 1000 दीपक बना चुकी हैं।

बता दें गोबर व मिट्टी से बने दीपक का धार्मिक महत्व होने के साथ ही इससे पर्यावरण की सुरक्षा भी होगी। सास हल्कु देवी और बहू कृष्णा देवी ने कहा कि हम सभी को चाईनीज माल का बहिष्कार कर स्वदेशी चीजें अपनानी चाहिए। इससे देश की आर्थिकी भी सुदृढ़ होगी। अगर सभी लोग दीपावली को गोबर और मिट्टी से तैयार किए दीपक जलाएंगे तो इससे पर्यावरण शुद्ध होगा वही यह दीपक ऑर्गेनिक खाद का कार्य भी करेंगे। तो वहीं दीपक बनने वाली गरीब व मध्यम वर्ग की महिलाओं की आर्थिकी में भी सुधार आएगा। सतनाम स्वयं सहायता समूह की अध्यक्षा व समाज सेवी कृष्णा ने कहा कि जीवन में समय के साथ तेजी से आगे बढ़ जाना ही महत्वपूर्ण नहीं है।

कभी-कभी जीवन में ठहराव, अपनी प्राचीन परंपराओं और प्रचलनों से जुड़े रहना भी अत्यधिक आवश्यक है। हमारे बच्चों ने जिस युग में आंखें खोली हैं, वहां चारों तरफ आधुनिकता की चकाचौंध है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने जीने की शैली को पूर्ण रूप से बदल दिया है। जहां बच्चे पहले मिट्टी में खेलकर बड़े होते थे। वहीं अब बच्चे टीवी, मोबाइल, लैपटॉप, वीडियो गेम्स में ही पलते हैं। बच्चे पहले मिट्टी की गुल्लक में एक-एक रूपये डाल कर आनंदित हो उठते थे। कृष्णा देवी ने समस्त जनता से आग्रह किया है कि उन महिलाओं से दीपक जरूर लें। जिन्हें पुरानी परंपरा व पर्यावरण बचाने को इतनी मेहनत की है। ताकि दीपावली के पावन अवसर पर सभी के जीवन में खुशियों की बहार आएगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published.